देवउठनी एकादशी (ग्यारस) का महत्व

देवउठनी एकादशी (ग्यारस) का महत्व – मित्रो साल में ग्यारस कई बार आती है पर देवउठनी एकादशी या देवउठनी ग्यारस साल मे केवल एक ही बार आती है और यह कई मायने में महत्वपूर्ण होती है. खासकर इस दिन हिन्दू धर्म में शादियों का आयोजन होता है. और इस दिन की एक खासियत यह भी है की जिस जोड़े के लगन नहीं आते तो वो भी ग्यारस माता के दिन शादी करते है तो आज हम इस पोस्ट में details में देवउठनी एकादशी के बारे में देखते है.देवउठनी एकादशी (ग्यारस) का महत्वआप सब देवउठनी एकादशी के बारे में जरूर जानते होंगे , और  अगर नहीं भी जानते होंगे तो कोई बात नहीं मेरी इस पोस्ट को पढ़के आप जान जायेगे की देवउठनी एकादशी (ग्यारस) क्या होति है.

ऐसा कहा जाता है कि इस दिन चार महीने शयन के बाद भगवान विष्णु जगते हैं. शास्त्रों में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि देवउठनी एकादशी  के दिन भगवान विष्णु के जागने के बाद देवता भी उनकी पूजा करते हैं.

और एक कारण ये भी है कि इस दिन लोगों को भगवान विष्णु के जागने पर उनकी पूजा करनी चाहिए. सिर्फ इतना ही नहीं, पुराणों में ऐसा भी कहा गया है कि जो लोग देवउठनी एकादशी का व्रत रखते हैं उनकी कई पीढ़ियां विष्णु लोक में स्थान प्राप्त करने के योग्य बन जाती हैं.

और दोस्तों शास्त्रों के मुताबिक, देवउठनी एकादशी  वाले दिन गन्ने का मंडप सजाना चहिये  और फिर मंडप के अंदर विधिवत रूप से भगवान विष्णु की आराधना करनी चाहिए. और  एक बात जो आप लोगों को विशेष रूप से ध्यान रखनी चाहिए वो ये है.

देवउठनी एकादशी (ग्यारस) का महत्व”

कि भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का पत्ता जरूर चढ़ाएं. गौर करने वाली बात ये है जो आपको याद रखनी चाहिए वह ये है कि इस दिन जिस भी व्यक्ति ने व्रत रखा हो उसे स्वयं तुलसी पत्ता नहीं तोड़ना चाहिए. बता दें कि ऐसा करने से मांगलिक कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती है और पूरा साल सुखमय व्यतीत होता है.

देवउठनी एकादशी का महत्व –

दोस्तों हिन्दू धर्म मै एकादशी के व्रत का महत्त्व सबसे अधिक मन जाता हे , दोस्तों इसका कारण ये हे की इसदिनसूर्य एवम अन्य ग्रह अपनी सिथति परिवर्तित करते हे ,जिसका इंसान की इन्द्रियों पर प्रभाव पड़ता हे तो दोस्तों प्रभाव मै संतुलन बनाने के लिए व्रत का सहारा लियाजाता हे ,

व्रत और भगवान का ध्यान ही इंसान को संतुलित रखते है.

देवउठनी एकादशी के कुछ और महत्व है.

इसे पाप विनाशनी और मुक्ति दिलाने वाली एकादशी कहा जाता है,  पुराणों में भी लिखा हे की इस दिन के आने से पहले तक गंगा स्नान का महत्व होता हे , दोस्तों इस दिन उपवास रखने का पुण्य कई तीर्थ दर्शन हजार अश्वमेघ के बराबर होता हे !

इस दिन का महत्व सवयं बर्ह्मा जी ने नारद जी को बताया था, उन्होंने कहा था इस दिन  एकान्छा करने  सेएक जन्म रात्रि भोज से दो जन्म ,और दोस्तों पूरा दिन व्रत करने से जन्मो के पापो का नाश होता है.

दोस्तों इस दिन व्रत से कई जन्मो का उद्धार होता हे , और बढ़ी से बढ़ी मनोकामनाएं पूरी होति है!

दोस्तों इस दिन रतजगा करने से कई पीढ़ियों को मरणो परान्त स्वर्ग मिलता हे , और दोस्तों जागरण का बहुत अधिक महत्व होता है, इससे मनुष्य अपनी इन्द्रियों पे विजय प्राप्त करता है!

दोस्तों इस व्रत की कथा सुनने और पढ़ने से सो गया के दान के बराबर पुण्य मिलता है !

दोस्तों किसी भी व्रत का फल तब ही मिलता हे , जब वह नियम के साथ विधि – विधान से किया जाये

दोस्तों इस प्रकार बर्ह्मा जी ने  देवउठनी एकादशी का महत्व नारद जी को बताया एवम प्रति कार्तिक मास मैइस व्रत का पालन करने को कहा

देव उठनी एकादशी व्रत कथा –

दोस्तों पहलेके युग में शंखासुर नामक एक बलशाली असुर था, इसी असुर ने तीनों लोकों में काफी उत्पात मचा रखा था. देवाताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की तब भगवान विष्णु शंखासुर से युद्घ करने गए. शंखासुर और भगवान विष्णु का युद्घ कई वर्षों तक होता रहा और अंत: में  शंखासुर मारा गया. युद्घ

करते हुए भगवान विष्णु काफी थक गए अतः क्षीर सागर में अनंत शयन करने लगे. चार महीने  सोने के बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन भगवान की निद्रा टूटी थी. देवताओं ने इस अवसर पर विष्णु भगवान की पूजा की थी. तो इस तरह देव उठनी एकादशी व्रत और पूजा का विधान शुरू हुआ था.

देव उठनी एकादशी व्रत विधि –

दोस्तों देवउठनी एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठ कर सनान अदि करना चाहिए !

दोस्तों इस दिन सूर्योदय के पूर्व ही व्रत का संल्कप लेके पूजा करके सूर्योदय होने पर भगवान सूर्य को अर्ध्य अर्पित करते है.

दोस्तों अगर सनान के लिए नदी अथवा कुए पे जाये तो अधिक अच्छा माना जाता है.

इस दिन पूरा दिन भूका रहकर व्रत किया जाता हे , अथवा दूसरे दिन पूजा करके व्रत पूरा माना जाता है.
और भोजन ग्रहण किया जाता है.

कई लोग इस दिन रतजगा करके पूरी रात भजन कीर्तन करते है.

इस दिन बेल पत्र, शमी पत्र , एवं तुलसी चढ़ाने का महत्व बताया जाता है.

देवउठनी  एकादशी के दिन तुलसी विवाह का महत्व होता है.

तुलसी विवाह का महत्व –

तुलसी एक गुणकारी पौधा है जिससे वातावरण एवं तनमन शुद्ध होते है. तुलसी विवाह में तुलसी के पौधे और विष्णु जी की मूर्ति या शालिग्राम  पाषाण का पूर्ण वैदिक रूप से विवाह कराया जाता है. और जब साल में एक बार देवउठनी एकादशी आती तब हिन्दू धर्म में शादिया कराई जाती है और में इस दिन का यह भी महत्व देखता हु की जिन लड़के – लड़कियों के लगन भी नहीं आते उनका भी तुलसी विवाह सम्पन्न कराया जाता है. अक्सर में मेरे गांव में ये चीजे देखता रहता हु.

तो Friends यह थी post “देवउठनी एकादशी (ग्यारस) का महत्व” में आशा करता हु, मैने इस post में आपको जो भी देवउठनी एकादशी के बारे में जानकारिया दी है वो आपको अच्छी लगी होगी और आप इसका महत्व भी जानगए होंगे और में चाहता हु, आप इस पोस्ट को अपने दोस्तों को भी Share करे ताकि उनको भी यह जानकारिया पता चले.

और आप इस संबंध में कुछ और जानते हो या मेरे द्वारा लिखी इस post में कोई त्रुटि हो तो आप अपने सुझाव हमे Comments के माध्यम से भेज सकते है.

 

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.