राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की Biography

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की Biography

 

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की Biography – महात्मा गाँधी एक ऐसी हस्ती जिसे सारी दुनिया बड़े ही सम्मान के साथ याद करती है एक ऐसा व्यक्तित्व जिसे जबतक दुनिया रहेगी तबतक भुलाया नहीं जा सकता और उनके द्वारा किये गए कामो को भी हम हमेशा याद रखेंगे तो आज हम इस post  में महात्मा गाँधी के सम्पूर्ण जीवन के बारे में देखेंगे .

 

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी एक ऐसे व्यक्तित्व थे जो हर किसी को अपनी और आकर्षित करते थे. एक ऐसा व्यक्ति जिसके बदन पर एक सादी धोती हो उसने अपने कर्मो से सूट-बूट वालो के भी पसीने छुड़वा दिए और जीवन में सफलता कैसे मिले यह भी हमे बापू से सीखना चाहिए उन्होंने अपने जीवन में एक focus रखा की हमे देश को आजाद करना है तो उसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत करी और आखिरकार सफलता प्राप्त करी महात्मा गाँधी भगवान राम के बहुत बड़े भक्त थे उनमे भगवान राम के गुण थे पर क्या आज हमारे में भगवान राम जैसे गुण है नहीं हमारे में उनके जैसे गुण नहीं है पर हमे बापू के जीवन से सिख लेना है और कठोर परिश्रम के द्वारा और एकता की शक्ति द्वारा जीवन में लक्ष्य हासिल करना है.

 

पूरा नाम    – मोहनदास करमचन्द गाँधी

जन्म       –  2  अक्टूबर 1869

जन्मस्थान   –  पोरबंदर (गुजरात)

पिता        –  करमचन्द गाँधी

माता        –  पुतलीबाई

शिक्षा        –  1887 में मेट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण. 1891 में इंग्लैंड में बेरिस्टर बनकर वो भारत लोटे

पत्नी        –  कस्तूरबा बाई

 

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का जन्म पश्चिम भारत में गुजरात के एक तटीय शहर पोरबंदर नामक स्थान पर 2 अक्टुंबर सन 1869 को हुवा था. उनके पिता करमचन्द गाँधी सनातन धर्म की पंसारी जाती से संबंध रखते थे और ब्रिटिश राज के समय काठियावाड़ की एक छोटी सी रियासत पोरबंदर के दिवान अर्थात प्रधान मंत्री थे.

 

गुजरती भाषा में गाँधी का अर्थ है पंसारी जबकि हिन्दी भाषा में गाँधी का अर्थ है इत्र फुलेल बेचने वाला जिसे अंग्रेजी में परफ्यूमर कहा जाता है. उनकी माता पुतलीबाई परनामी विषय समुदाय की थी. पुतलीबाई करमचन्द की छोटी पत्नी थी. उनकी पहली तीन पत्निया प्रसव के समय मर गयी थी.

 

भक्ति करने वाली माता की देखरेख और उस छेत्र की जेन परम्परावो के कारण युवा मोहनदास पर वे प्रभाव प्रारम्भ में ही पड़ गए थे जिन्होंने आगे चलकर उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इन प्रभावों में शामिल थे दुर्बलों में जोश की भावना , शाकाहारी जीवन , आत्मशुद्धि के लिए उपवास तथा विभिन्न जातियों के लोगो के बिच सहिष्णुता यह सारे गुण उनमे बचपन से ही प्रवाहित होगये थे .

 

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की Biography”

 

महात्मा गाँधी की विदेश में शिक्षा और वकालत –

मोहनदास अपने परिवार में सबसे ज्यादा पड़े – लिखे थे इसलिए उनके परिवार वाले ऐसा मानते थे की वह अपने पिता और चाचा का उत्तराधिकारी बन सकते थे. उनके एक पारिवारिक मित्र मावजी द्वे ने सलाह दी की एक बार मोहनदास लंदन से बेरिस्टर बन जाए तो उनको आसानी से दिवान की पदवी मिल सकती थी. उनकी माता पुतलीबाई और परिवार के अन्य सदस्यों ने उनके विदेश जाने के विचार का विरोध किया पर मोहनदास के आश्वासन पर राजी हो गए.

 

वर्ष 1888 में मोहनदास यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में कानून की पढ़ाई करने और बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैंड चले गए. अपनी माँ को दिए गए वचन के अनुसार ही उन्होंने लन्दन में अपना वक्त गुजारा. वहां उन्हें शाकाहारी खाने से संबंधित बहुत कठिनाई हुई और शुरुवाती दिनों में कई बार भूखे ही रहना पड़ता था. और धीरे – धीरे उन्होंने शाकाहारी भोजन वाले रेस्टोरेंट के बारे में पता लगा लिया. इसके बाद उन्होंने ‘ वेजिटेरियन सोसायटी ‘ की सदस्य्ता भी ग्रहण की इस सोसायटी के कुछ सदस्य भी थे और उन्होंने मोहनदास को गीता पड़ने का सुझाव दिया.

 

जून 1891 में महात्मा गाँधी भारत लोट गए वहां जाकर उन्हें अपनी माँ की मोत के बारे में पता चला. उन्होंने बॉम्बे में वकालत की शुरुवात की पर उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली इसके बाद वो राजकोट चले गए जहा उन्होंने जरुरतमंदो के लिए मुकदमे की अर्जिया लिखने का कार्य शुरू कर दिया परन्तु कुछ समय बाद उन्हें यह काम भी छोड़ना पड़ा.

 

महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका में  –

दोस्तों महात्मा गाँधी 24 साल की उम्र में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे. वह प्रिटोरिया स्तिथ कुछ  भारतीय व्यापारियों के न्यायिक सलाहकार के तोर पर वहां गए थे. उन्होंने अपनी जीवन के 21 साल दक्षिण अफ्रीका में बिताये जहा उनके राजनैतिक विचार और नेतृत्व कौशल का विकास हुवा. दक्षिण अफ्रीका में उनको गंभीर नस्ली भेदभाव का सामना करना पड़ा. एक बार ट्रेन में प्रथम श्रेणी कोच की वैध टिकट होने के बाद तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने से इंकार करने के कारण उन्हें ट्रेन से बाहर फेक दिया गया. ये सारी घटनाये उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ बन गयी और मौजूदा सामाजिक और राजनैतिक अन्याय के प्रति जागरूकता का कारण बनी दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर हो रहे अन्याय को देखते हुए उनके मन में ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत भारतीयों के सम्मान तथा स्वयं अपनी पहचान से संबंधित प्रश्न उठने लगे.

 

दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी ने भारतीयों को अपनी राजनैतिक और सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने भारतीयों की नागरिकता संबंधित मुद्दे को भी दक्षिण अफ़्रीकी सरकार के सामने उठाया और सन 1906 के जुलु युद्ध में भारतीयों को भर्ती करने के लिए ब्रिटिश अधिकारियो को सक्रिय रूप से प्रेरित किया. गाँधी के अनुसार अपनी नागरिकता के दावों को क़ानूनी जामा पहनाने के लिए भारतीयों को ब्रिटिश युद्ध प्रयासों में सहयोग देना चाहिए .

 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का संघर्ष (1916 -1945)

वर्ष 1914 में गाँधी दक्षिण अफ्रीका से भारत वापिस लोट आये. इस समय तक गाँधी एक राष्ट्रवादी नेता और संयोजक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे. वह उदारवादी कांग्रेस नेता गोपाल कृष्ण गोखले के कहने पर भारत आये थे और शुरुवाती दौर में गाँधी के विचार बहुत हद तक गोखले के विचारो से प्रभावित थे. प्रारम्भ में गाँधी जी ने देश के विभिन्न भागो का दौरा किया और राजनैतिक , आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को समझने की कोशिश की

 

चम्पारण और खेड़ा सत्याग्रह –

बिहार के चम्पारण और गुजरात के खेड़ा में हुए आंदोलनों ने गाँधी को भारत में पहली राजनैतिक सफलता दिलाई. चम्पारण में ब्रिटिश जमींदार किसानो को खाद्य फसलों की बजाय निल की खेती करने के लिए मजबूर करते थे. और सस्ते मूल्य पर फसल खरीदते थे. जिससे किसानो की स्थिति बदतर होती जारही थी. इस कारण वो अत्यधिक गरीबी से घिर गए एक विनाशकारी अकाल के बाद अंग्रेजी सरकार ने दमनकारी कर लगा दिए जिनका बोझ दिन – प्रतिदिन बढ़ता ही गया. कुल मिलाकर स्थिति बहुत निराशाजनक थी. गाँधी जी ने जमीदारो के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और हड़तालों का नेतृत्व किया जिसके बाद गरीब और किसानो की मानगो को माना गया.

 

सन 1918 में गुजरात स्थित खेड़ा बाढ़ और सूखे की चपेट में आगया था. जिसके कारण किसानो और गरीबो की स्थिति बदतर हो गयी और लोग कर माफ़ी की मांग करने लगे. खेड़ा में गाँधी जी के मार्गदर्शन में सरदार पटेल ने अंग्रेजो के साथ इस समस्या पर विचार विमर्श के लिए किसानो का नेतृत्व किया. इसके बाद अंग्रेजो ने राजस्व संग्रहण से मुक्ति देकर सभी केदियो को रिहा कर दिया. इस प्रकार चम्पारण और खेड़ा के बाद महात्मा गाँधी की ख्याति देश भर में फेल गयी और वह स्वतंत्रता आंदोलन के एक महत्वपूर्ण नेता बनकर उभरे.

 

खिलाफत आंदोलन –

कांग्रेस के अंदर और मुस्लिमों के बिच अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का मौका गाँधी को खिलाफत आंदोलन के जरिये मिला. खिलाफत एक विश्व्यापी आंदोलन था जिसके द्वारा खलीफा के गिरते प्रभुत्व का विरोध सारी दुनिया के मुसलमानों द्वारा किया जा रहा था. प्रथम विश्व युद्ध में पराजित होने के बाद ऑटोमन साम्राज्य विखंडित कर दिया गया था. जिसके कारण मुसलमानों को अपनी धर्म और धार्मिक स्थलों के सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई थी.

 

भारत में खिलाफत का नेतृत्व ‘ आल इंडिया मुस्लिम कांफ्रेंस ‘ द्वारा किया जा रहा था. धीरे-धीरे गाँधी इसमें मुख्य प्रवक्ता बन गए. भारतीय मुसलमानों के साथ एकजुटता व्यक्त करने के लिए उन्होंने अंग्रेजो द्वारा दिए सम्मान और मैडल वापिस कर दिया. इसके बाद गाँधी न सिर्फ कांग्रेस बल्कि देश के एकमात्र ऐसे नेता बन गए जिसका प्रभाव विभिन्न समुदायों के लोगो पर था.

 

असहयोग आंदोलन –

गाँधी जी का मानना था की भारत में अंग्रेजी हुकूमत भारतीयों के सहयोग से ही सम्भव हो पाई थी और अगर हम सब मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ हर बात पर असहयोग करे तो आजादी सम्भव है. गाँधी जी की बढ़ती लोकप्रियता ने उन्हें कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता बना  दिया था. और वह इस स्थिति में थे की अंग्रेजो के खिलाफ असहयोग , अहिंसा तथा शांतिपूर्ण प्रतिकार जैसे अस्त्रों का प्रयोग कर सके. इसी बिच जलियावाला नरसंहार ने देश को भारी आघात पहुंचाया जिससे जनता में क्रोध और हिंसा की ज्वाला भड़क उठी थी.

 

दोस्तों गाँधी जी ने स्वदेशी निति का आह्वान किया जिसमे विदेशी वस्तुओं विशेषकर अंग्रेजी वस्तुओं का बहिस्कार करना था. उनका कहना था की सभी भारतीय अंग्रेजो द्वारा बनाए वस्त्रो की अपेक्षा हमारे अपने लोगो द्वारा हाथ से बनाई गयी खादी पहने उन्होंने पुरुषो और महिलाओं को प्रतिदिन सूत काटने के लिए कहा. इसके आलावा महात्मा गाँधी ने ब्रिटेन की शैक्षिक संस्थावो और अदालतों का बहिष्कार , सरकारी नोकरियो को छोड़ने तथा अंग्रेजी सरकार से मिले तमगो और सम्मान को वापस लौटाने का भी अनुरोध किया.

 

असहयोग आंदोलन को अपार सफलता मिल रही थी जिससे समाज के सभी वर्गो में जोश और भागीदारी बढ़ गयी लेकिन फरवरी 1922  में इसका अंत चोरी-चोरा कांड के साथ हो गया इस हिंसक घटना के बाद गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया. उन्हें गिरफ्तार कर उनके ऊपर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया जिसमे उन्हें 6 साल कैद की सजा सुनाई गयी. उन्हें फरवरी 1924  में सरकार ने रिहा कर दिया.

 

स्वराज और नमक सत्याग्रह –

असहयोग आंदोलन के दौरान गिरफ्तारी के बाद गाँधी जी फरवरी 1924  में रिहा हुए और सन 1928  तक सक्रिय राजनीती से दूर ही रहे. इस दौरान वह स्वराज पार्टी और कांग्रेस के बिच मनमुटाव को कम करने में लगे और इसके अतिरिक्त अस्पृश्यात , शराब , अज्ञानता और गरीबी के खिलाफ भी लड़ते रहे.

 

इसी समय अंग्रेजी सरकार ने सर जान साइमन के नेतृत्व में भारत के लिए एक नया संवैधानिक सुधार आयोग बनाया पर उसका एक भी सदस्य भारतीय नहीं था. जिसके कारण भारतीय राजनैतिक दलों ने इसका बहिष्कार किया. इसके पश्चात् दिसम्बर 1928 के कलकत्ता अधिवेशन में गाँधी जी ने अंग्रेजी हुकूमत को भारतीय साम्राज्य को सत्ता प्रदान करने के लिए कहा और ऐसा न करने पर देश की आजादी के लिए आंदोलन का सामना करने के लिए तैयार रहने के लिए भी कहा.

 

अंग्रेजो द्वारा कोई जवाब नहीं मिलने पर 31 दिसंबर 1929 को लाहौर में भारत का झंडा फेहराया गया और कांग्रेस ने 20 जनवरी 1930 का दिन भारतीय स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया. इसके पश्चात गाँधी जी ने सरकार द्वारा नमक पर कर लगाए जाने के विरोध में नमक सत्याग्रह चलाया जिसके अंतर्गत उन्होंने 12 मार्च से 6 अप्रेल तक अहमदाबाद से  दांडी यात्रा , गुजरात , तक लगभग 388 किलोमीटर की यात्रा की इस यात्रा का उद्देश्य स्वयं नमक उतपन्न करना था. इस यात्रा में हजारो की संख्या में भारतीयों ने भाग लिया और अंग्रेजी सरकार को विचलित करने में सफल रहे. इस दौरान सरकार ने लगभग 60 हजार से अधिक लोगो को गिरफ्तार कर जेल भेजा.

 

इसके बाद लार्ड इरविन के प्रतिनिधित्व वाली सरकार ने गाँधी जी के साथ विचार – विमर्श करने का निर्णय लिया जिसके फलस्वरूप गाँधी-इरविन संधि पर मार्च 1931 में हस्ताक्षर हुए. गाँधी-इरविन संधि के तहत ब्रिटिश सरकार ने सभी राजनैतिक केदियो को रिहा करने के लिए सहमति दे दी. इस समझौते के परिणामस्वरूप गाँधी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया परन्तु यह सम्मेलन कांग्रेस और दूसरे राष्ट्रवादियो के लिए घोर निराशाजनक रहा. इसके बाद गाँधी फिर से गिरफ्तार कर लिए गए और सरकार ने  राष्ट्रवादी आंदोलन को कुचलने की कोशिश की.

 

1934 में गाँधी ने कांग्रेस की सदस्य्ता से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने राजनैतिक गतिविधियों के स्थान पर अब ‘रचनात्मक कार्यक्रमों’ के माध्यम से ‘सबसे निचले स्तर से’ राष्ट्र के निर्माण पर अपना ध्यान लगाया. उन्होंने ग्रामीण भारत को शिक्षित करने, छुवाछुत के खिलाफ आंदोलन जारी करने, कटाई,बुनाई,और अन्य कुटीर उद्योगों को बढ़वा देने और लोगो की आवश्कताओ के अनुकूल शिक्षा प्रणाली बनाने का काम शुरू किया.

 

द्वितीय विश्व युद्ध और ‘भारत छोडो आन्दोलन’ –

द्वितीय विश्व युद्ध के आरम्भ में गाँधी जी अंग्रेजो को ‘अहिंसात्मक नैतिक सहयोग’ देने के पक्षधर थे परन्तु कांग्रेस के बहुत से नेता इस बात से नाखुश थे की जनता  के प्रतिनिधियों  के परामर्श लिए बिना ही सरकार ने देश को युद्ध में झोक दिया था. गाँधी ने घोषणा की कि एक तरह भारत को आजादी देने से इंकार किया जा रहा था. और दूसरी तरफ लोकतान्त्रिक शक्तियों की जित के लिए भारत को युद्ध में शामिल किया जा रहा था. जैसे-जैसे युद्ध बढ़ता  गया गाँधी जी और कांग्रेस ने ‘भारत छोडो’ आन्दोलन की मांग को तीव्र कर दिया.

 

‘भारत छोडो’ स्वतंत्रता आंदोलन का संघर्ष एक सर्वाधिक शक्तिशाली आन्दोलन बन गया जिसमे व्यापक हिंसा और गिरफ्तारी हुई. इस संघर्ष में हजारो की संख्या में स्वतंत्रता सेनानी या तो मारे गए या घायल हो गए और हजारो गिरफ्तार भी कर लिए गए. गाँधी जी ने यह स्पष्ट कर दिया था की वह ब्रिटिश युद्ध प्रयासों को समर्थन तब तक नहीं देंगे जब तक भारत को तत्काल आजादी ना दे दी जाये. उन्होंने यह भी कह दिया था की व्यक्तिगत हिंसा के बावजूद यह आंदोलन बंद नहीं होगा. उनका मानना था की देश में व्याप्त सरकार अराजकता असली अराजकता से भी खतरनाक है. गाँधी जी ने सभी कांग्रेसियो और भारतीयों को  अहिंसा के साथ करो या मरो के साथ अनुशासन बनाये रखने को कहा.

 

जैसा की सबको अनुमान था अंग्रेजी सरकार ने गाँधी जी और कांग्रेस कार्यकारणी समिति के सभी सदस्यों को मुंबई में 9 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर लिया और गाँधी जी को पुणे के आंगा खा महल ले जाया गया जहा उन्हें दो साल तक बंदी बनाकर रखा गया. इसी दौरान उनकी पत्नी कस्तूरबा गाँधी का देहांत 22 फरवरी 1944 को हो गया और कुछ समय बाद गाँधी जी भी मलेरिया से पीड़ित हो गए. अंग्रेज उन्हें इस हालत में जेल में नहीं छोड़ सकते थे.

 

इस लिए जरूरी उपचार के लिए 6 मई 1944 को उन्हें रिहा कर दिया गया. आंशिक सफलता के बावजूद भारत छोडो आंदोलन ने भारत को संगठित कर दिया और द्वितीय विश्व युद्ध के अन्त तक ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट संकेत दे दिया था. की जल्द ही सत्ता भारतीयों के हाथ सोप दी जाएगी. गाँधी जी ने भारत छोडो आंदोलन समाप्त कर दिया और सरकार ने लगभग एक लाख राजनैतिक केदियो को रिहा कर दिया. और अन्त में वह दिन भी आगया जिसके लिए इतने संघर्ष और इतने आंदोलन किये गए थे. अर्थात 15 अगस्त 1947 को हिन्दुस्तान को आजादी मिल गई.

 

देश का विभाजन और आजादी –

जैसा की पहले कहा जा चूका है, द्व्तीय विश्व युद्ध के समाप्त होते-होते ब्रिटिश सरकार ने देश को आजाद करने का संकेत दे दिया था. भारत की आजादी के आंदोलन के साथ-साथ जिन्ना के नेतृत्व में एक ‘अलग मुसलमान बहुल्य देश’ (पाकिस्तान) की मांग तीव्र हो गयी थी और 40 दशक में इन ताकतों ने एक अलग राष्ट्र (पाकिस्तान) की मांग को वास्तविकता में बदल दिया था. गाँधी जी देश का बटवारा नहीं चाहते थे क्योकि यह उनके धार्मिक एकता के सिद्धांत से बिलकुल अलग था. पर ऐसा हो न पाया और अंग्रेजो ने देश को दो टुकड़ो भारत और पाकिस्तान में विभाजित कर दिया.

 

महात्मा गाँधी की हत्या –

30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की दिल्ली के ‘बिरला हॉउस’ में शाम 5:17 पर हत्या कर दी गयी. गाँधी जी एक प्रार्थना सभा को सम्बोधित करने जा रहे थे. तब उनको नाथूराम गोडसे ने उनके सीने में 3 गोलिया दाग दी. ऐसा माना जाता है की ‘है राम’ उमके मुख से निकले अंतिम शब्द थे. नाथूराम गोडसे और उसके सहयोगी पर मुकदमा चलाया गया और 1949 में उन्हें मोत की सजा सुनाई गयी.

 

तो दोस्तों यह थी post ” राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की Biography ” आपको यह post कैसी लगी आप हमे अपने Comments के माध्यम से जरूर बताये और दोस्तों मेरा आपसे यह कहना है की हमे भी अपने जीवन में गाँधी जी जैसे गुणों को धारण करना है हमे भी उनकी तरह जीवन बिताना है हमारे अंदर भी लोगो को जोड़ने की शक्ति होना चाहिए और जैसा उन्होंने अहिंसा का रास्ता चुना हमे भी वैसा ही रास्ता चुनना होगा . और हमे भी अपने देश की तरक्की के स्तम्भ बनना होगा और उसे हमेशा आगे लेजाने का प्रयास करना होगा.

 

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